How Lockdown affects Environment ? - लॉकडाउन का पर्यावरण पर क्या प्रभाव पड़ा ?

नमस्कार दोस्तों, तो कैसे है आप लोग ? कोरोना वायरस ने पूरी दुनिया में आतंक मचा रखा है। यदि इस भयानक संकट से कुछ सकारात्मक लेना है, तो यह हो सकता है की हम भविष्य में अछि हवा में सांस ले सकते है। इस कोरोना वायरस की महामारी ने पूरी दुनिया भर में लॉकडाउन लगा दिया, उसके चलते औद्योगिक गतिविधि और हवाई उड़ानों पर रोक लगा दिया गया। उसकी वजह से पूरी दुनिया भर में ग्रीनहाउस गॅस उत्सर्जन और वायु प्रदुषण कम हो गया। तो चलिए विस्तार में जानते है लॉकडाउन का पर्यावरण पर क्या प्रभाव पड़ा ? 

How Lockdown affects environment
                                                                      Source : Internet

भारत के पर्यावरण पर लॉकडाउन का क्या असर हुआ ?

कई कारखानों और व्यवसायों को बंद करने के साथ, सड़क पर कम गाड़ियां और आकाश में कम विमानों के साथ, हमारा पर्यावरण धीरे-धीरे ठीक हो रहा है। World Health Organisation (WHO) का अनुमान है की वायु प्रदुषण के कारण होनेवाली बिमारियों से हर साल लगभग ३ मिलियन लोग मरते है, और शहरी क्षेत्रों में रहने वाले ८० % से अधिक लोग ऐसी हवा के संपर्क में आते है जो सुरक्षित सीमा के बाहर है। 

अभी के डेटा से पता चलता है की मुख्य शहरों में हानिकारक सूक्ष्म कण (Microscopic Particulate Matter know as PM 2.5) और नाइट्रोजन डाइऑक्साइड, जो वाहनों और पावर प्लांट से रिलीज़ होता है, इनका स्तर बहुत कम दर्ज हो रहा है। PM 2.5, जो व्यास में २.५ माइक्रोमीटर से छोटा है, इसको विशेष रूप  खतरनाक माना जाता है क्योंकि यह फेफड़ों की गहराई में घूम सकता है और अन्य अंगों और रक्तप्रवाह में गुजरता है, जिससे गंभीर स्वास्थ बीमारियां हो सकती है। दुनिया की ३० सबसे प्रदूषित शहरों में से २१ शहरें भारत में है और IQAir AirVisual की २०१९ की विश्व वायु गुणवत्ता रिपोर्ट के अनुसार, भारत में प्रदूषक तत्वों में अचानक गिरावट और नीला आसमान एक अच्छा संकेत देते है। 

राजधानी नई दिल्ली में, लॉकडाउन शुरू होने के बाद, सरकारी आंकड़ों के अनुसार PM 2.5 की औसत सांद्रता (Concentration) एक हप्ते में ७१% से कम हो गयी है, जो २० मार्च को ९१ माइक्रोग्राम प्रति क्यूबिक मीटर से गिरकर २७ मार्च को २६ माइक्रोग्राम प्रति क्यूबिक मीटर हो गयी। World Health Organisation (WHO) के अनुसार PM 2.5 की औसत सांद्रता (Concentration) २५ माइक्रोग्राम प्रति क्यूबिक मीटर से अधिक हो तो उसे असुरक्षित माना जाता है। इसी अवधि में नाइट्रोजन डाइऑक्साइड ५२ प्रति घन मीटर से १५ तक चला गया, यह भी ७१% की गिरावट है। मुंबई, चेन्नई, कोलकाता और बैंगलोर ने भी इन वायु प्रदूषकों में गिरावट दर्ज की है। 

२५ मार्च को राष्ट्रीय लॉकडाउन शुरू होने से पहले ही, भारत में चरणबद्ध बंद का असर पड रहा था। मार्च २०१८ और २०१९ की तुलना में, मार्च २०२० के पहले तीन सप्ताह में, मुंबई, पुणे और अहमदाबाद शहरों में नाइट्रोजन डाइऑक्साइड के स्तर में ४०-५०% की गिरावट आई है। परिवहन क्षेत्र और अन्य उत्सर्जन से संबंधित गतिविधियों में कमी के कारण जीवाश्म ईंधन उत्सर्जन में कमी से वायु प्रदूषक धीरे-धीरे कम हो रहे है। २२ मार्च को देशव्यापी कर्फ्यू की वजह से सबसे कम एक दिवसीय ट्राफिक प्रदुषण का स्तर दर्ज किया गया था। 

how lockdown affects environment
Source : Internet 

लॉकडाउन का दुनिया के पर्यावरण पर क्या असर रहा ?

यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी के Sentinel-5P उपग्रह के माप से पता चलता है की जनवरी के अंत और फरवरी २०२० की शुरुवात में, एशिया और यूरोप में शहरों और औद्योगिक क्षेत्रों में नाइट्रोजन डाइऑक्साइड का स्तर २०१९ में समान अवधि की तुलना में ४०% कम था। यूके में २३ मार्च को राष्ट्रव्यापी लॉकडाउन की घोषणा के दो हप्ते बाद, कुछ शहरों में नाइट्रोजन डाइऑक्साइड प्रदुषण २०१९ की तुलना से ६०% तक गिर गया था। नासा ने खुलासा किया की २०१५ से २०१९ के मासिक औसत की तुलना में २०२० में न्यूयॉर्क और उत्तरी-पूर्वी संयुक्त राज्य अमेरिका के अन्य प्रमुख महानगरीय क्षेत्रों में प्रदुषण ३०% कम था। 

अधिकांश नाइट्रोजन डाइऑक्साइड सड़क परिवहन और पावर प्लांट से आता है, और यह अस्थमा जैसी श्वसन संबंधी बिमारियों को बढ़ा सकता है। यूरोपीय संघ की सीमा के कई देशों के साथ यूरोप के लिए नाइट्रोजन डाइऑक्साइड उत्सर्जन एक विशेष रूप से कांटेदार समस्या रही है। अकेले वुहान में ११ मिलियन लोग लॉकडाउन में थे। चीन आमतौर पर प्रति वर्ष ३० मेगा टन से अधिक नाइट्रोजन डाइऑक्साइड का उत्सर्जन करता है, २०१९ के अनुमान के साथ ४० मेगा टन तक पहुंच गया है। चीन पुरे एशिया के नाइट्रोजन डाइऑक्साइड का ५०% से अधिक उत्सर्जन करता है। हर एक टन नाइट्रोजन डाइऑक्साइड जो इस महामारी की वजह से उत्सर्जित नहीं हुआ वह सड़क से प्रति वर्ष ६२ कारों को हटाने के बराबर है। तो आप अनुमान लगा सकते है की चीन में, नाइट्रोजन डाइऑक्साइड के उत्सर्जन में मामूली १०% की कमी भी सड़क से ४८,००० कारों को हटाने के बराबर है। लेकिन कुछ क्षेत्रों में जनवरी और फरवरी के लिए २०१९ के स्तर पर नाइट्रोजन डाइऑक्साइड में ४०% की गिरावट १९२,००० कारों को दूर करने के समान है।

यह एक अच्छा संकेत देता है की अगर हमने कार के उपयोग को चरणबद्ध तरीके से बंद कर दिया और उसे बिजली पर चलने वाले वाहनों से बदल दिया तो स्थायी रूप से अच्छी गुणवत्ता वाली हवा की प्राप्ती हो सकती है। इस तरह से विद्युतीकरण परिवहन, विस्तारित रेल लाइनों और अधिक इलेक्ट्रिक कारों और चार्जिंग स्टेशनों के साथ, नाइट्रोजन डाइऑक्साइड जैसे वायु प्रदूषकों को कम किया जा सकता है। लेकिन इलेक्ट्रिक वाहन केवल उतनी ही स्वच्छ है जितनी की बिजली। बिजली उत्पादन से मासिक नाइट्रोजन डाइऑक्साइड को १०% कम करना एक साल के लिए ५०० कोयला बिजली स्टेशनों को बंद करने के बराबर होगा। लोकडाउन ने हवा की गुणवत्ता में सुधार दिखाया है जो की वैश्विक स्तर पर उत्सर्जन कम होने पर संभव है। यह महामारी हमे दिखा रही है की भविष्य कम वायु प्रदुषण के साथ कैसे दिख सकता है, या फिर यह सिर्फ आगे की चुनौती के पैमाने का संकेत दे सकता है। इसके साथ ही यह सरकारों और व्यवसायों को चुनौती देता है की वे यह विचार करें की महामारी के बाद चीजों को अलग-अलग तरीके से कैसे किया जा सकता है, ताकि हवा की गुणवत्ता में अस्थायी सुधार हो सके।


और पढ़े :



Previous
Next Post »